रात के दो बजे थे। राजत दरवाज़ा पीट रहा था। शराब की गंध इतनी तीव्र थी कि दरवाज़ा खोलने से पहले ही विद्या को उल्टी-सी आने लगी। उसने चुपचाप कुंडी खोली। राजत लड़खड़ाता हुआ अंदर आया, आँखें लाल, होंठ सूजे हुए।
“तूने मेरी माँ से क्या कहा?” वह गुर्राया।
विद्या कुछ बोलती, उससे पहले उसका हाथ उठा — और फिर वही हुआ जो अक्सर होता था। एक थप्पड़, फिर दूसरा। इस बार वह ज़मीन पर गिर पड़ी। उसकी कोहनी छिल गई, होंठ फट गया।
“तू मुझे बदनाम कर रही है मोहल्ले में? तू अब भी उस छोरे से आँखें मिलाती है?” राजत चीखा।
शेवंती दरवाज़े पर खड़ी थी, लेकिन कुछ नहीं बोली। उसकी आँखों में न सहानुभूति थी, न विरोध। बस एक अजीब-सी चुप्पी।
अगली सुबह, राजत ने बैग पैक किया। “काम पर जा रहा हूँ। एक महीना बाहर रहूँगा। साइट पर। फोन मत करना।”
शेवंती ने सिर हिलाया। विद्या ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, होंठ पर पट्टी थी।
राजत चला गया। घर में एक अजीब-सी शांति फैल गई — जैसे कोई तूफ़ान पीछे छोड़ गया हो, और अब हवा भी साँस रोककर चल रही हो।
शाम को, सुमित आया। विद्या आँगन में तुलसी को पानी दे रही थी। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन आँखें स्थिर थीं।
“कैसी हो?” सुमित ने पूछा।
“ठीक हूँ,” उसने कहा, बिना देखे।
“झूठ मत बोल,” सुमित ने धीरे से कहा।
विद्या ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। वहाँ चिंता थी, लेकिन कुछ और भी — एक बेचैनी, एक खिंचाव।
“तू इस समाय यहाँ क्या कर रहा है ?” उसने पूछा।
“तुझे देखा तो हाल पूछने आ गया ” सुमित ने कहा।
बातो बातो में सुमित को पता चल गया के रजत १ महीने के लिए बहार गया है । विद्या भी सिग्नल कनेक्ट कर रही थी तो उसने सोचा आज ही कुछ कोशिश की जाए
उस रात, विद्या ने दरवाज़ा खुला छोड़ा।
वह विद्या के कमरे के पास गया और दरवाज़ा खटखटाया।
“खुला है”
कमरे में सिर्फ एक दिया जल रहा था। उसकी लौ दीवार पर कांपती हुई लकीरें बना रही थी — जैसे कोई पुरानी याद धीरे-धीरे लौट रही हो।
विद्या खड़ी थी, खिड़की के पास। साड़ी ढीली थी, बाल खुले थे, और होंठ पर पट्टी थी — हल्की, लेकिन बोलती हुई। उसकी कोहनी पर मलहम था, और चेहरा थका हुआ, लेकिन शांत।
सुमित दरवाज़ा बंद करके धीरे-धीरे उसके पास आया। उसके कदमों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी — जैसे वह जानता था कि यह क्षण भागने का नहीं, रुकने का है।
“तू डरता है?” विद्या ने पूछा — उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन सीधी।
“हाँ,” सुमित ने कहा। “तेरे दर्द से नहीं… तेरे पास आने से।”
“फिर भी आ गया ?”
“हाँ।”
विद्या ने उसका हाथ पकड़ा — धीरे, लेकिन दृढ़ता से। उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं, लेकिन पकड़ में एक अजीब-सी गर्मी थी।
“तेरे हाथ काँप रहे हैं,” विद्या ने कहा।
“क्योंकि मैं पहली बार किसी को छू रहा हूँ… जो टूटा हुआ है, लेकिन फिर भी मुझे बुला रहा है।”
“मैं टूटी हूँ,” विद्या बोली। “पर आज मैं तुझसे जुड़ना चाहती हूँ — बिना मरहम के, बिना सहानुभूति के।”
सुमित ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ कोई आँसू नहीं थे, सिर्फ एक खुला निमंत्रण।
“तेरे होंठों पर पट्टी है,” उसने कहा। “पर अब भी कुछ कह रहे हैं।”
“कह रहे हैं — आ जा।
बैठ जा।
छू मत, पर महसूस कर।”
सुमित ने धीरे से उसके माथे को छुआ, विद्या की आँखें बंद हो गईं। उसकी साँसें गहरी हो गईं।
“तेरा माथा ठंडा है,” सुमित ने कहा। “पर तेरी साँसें जलती हैं।”
“तेरा दिल काँपता है,” विद्या ने कहा। “पर धड़कता सिर्फ मेरे लिए है।”
सुमित ने उसकी पट्टी को नहीं छुआ — लेकिन उसके गाल के पास उंगलियाँ ले गया, बिना स्पर्श किए। हवा में ही एक कंपन था।
“मैं तुझे चाहता हूँ,” उसने कहा। “पर तेरी चोटों से नहीं डरता। मैं डरता हूँ — कि कहीं तू मुझे सिर्फ मरहम समझे।”
“तू मरहम नहीं है,” विद्या बोली। “तू वो आग है — जिससे मैं फिर से गढ़ी जा सकती हूँ।”
“तो आज… मैं तुझे छूना नहीं चाहता। मैं तुझे सुनना चाहता हूँ।”
“तो सुन,” विद्या ने कहा। “मैं तुझे चाहती हूँ। तेरे शब्दों से, तेरी साँसों से, तेरे उस डर से भी… जो तुझे रोकता है, पर मुझे खींचता है।”
सुमित ने धीरे से उसकी उंगलियाँ अपने होंठों से छूईं — बहुत हल्के से, जैसे कोई वादा कर रहा हो कि वह तोड़ेगा नहीं।
“मैं रुक सकता हूँ। पर आज… तेरी चुप्पी मुझे रोकने नहीं दे रही।”
“तो मत रुक। आज मैं टूटी नहीं हूँ।
आज मैं खुली हूँ।
तेरे लिए।
तेरे शब्दों के लिए।
तेरे उस स्पर्श के लिए — जो अभी सिर्फ हवा में है।”
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उनके बीच शब्दों की लहरें चल रही थीं — जो देह से पहले आत्मा को छू रही थीं।
सुमित ने विद्या की कमर में हाथ दाल के उसको अपने सीने से लगाया।
विद्या उसकी बाहो में पिघल रही थी। सुमित के जिस्म से मिल रही गरमी विद्या के अंदर आग लगा रही थी।
विद्या सुमित के स्पर्श को अपने पूरे जिस्म पर मेहसूस करना चाहती थी। सुमित उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा था और अपना लंड उसके पेट पे दबा रहा था। उसने विद्या का चेहरा अपने हाथ में पकड़ा और दोनों के होठ मिल गए। दोनों एक दूसरे का रस पीने लग गए।
विद्या ने सुमित का लंड महसूस किया तो खुद को रोक न पायी। उसका हाथ सुमित के लंड पर चला गया। दोनों एक अंदर ज्वालामुखी उबलने लगा। सुमित के हाथ विद्या की चूचियों पर चले गए तो विद्या की सासे रेल गाडी की तरह तेज़ हो गयी। दोनों ने एक दूसरे के कपडे उतारे।
सुमित ने खड़े खड़े विद्या की चूत में हाथ लगाया तो वाहा पहले से ही झरना बह रहा था। विद्या को दीवार से सटा कर ऊपर उठा दिया। विद्या सुमित के जिस्म और दीवार के बीच फस्स कर हवा में झूल रही थी।
तब सुमित ने उसके घुटनो के नीचे से हाथ डाल कर उसके शरीर को दीवार से दबा दिया। विद्या की चूत आगे हो गयी। सुमित ने अपना लंड विद्या की चूत पे लगाया और एक धक्के में पूरा अंदर डाल दिया ।
सूखा लंड गीली चूत को रेतते हुए अंदर गया। दोनों को दर्द और आनंद एक साथ महसूस हुआ। सुमित विद्या को खड़े खड़े चोदने लग गया। कभी उसके दूध चूसता और कभी उसके होठ। कभी उसके कंधे पे काटता कभी उसकी गर्दन पे काटता।
सुमित मदहोश हो कर विद्या को पूरे जोश से चोद रहा था। विद्या के लिए ये बिलकुल नया अनुभव था क्युकी उसका शराबी पति रजत कभी उसको नशे में ऐसा सुख नहीं दे पाया था। वह अपना दर्द भूल के चुदाई के आनंद में पूरी तरह डूब गयी गयी थी।
वह झड़ने के करीब थी, उसने सुमित को और कस के पकड़ लिया। सुमित समझ गया था के वह झड़ने वाली है , सुमित ने भी और तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए। दोनों एक दूसरे को काटने और नोचने लग गए। विद्या झाड़ गयी और उसने अपने नाखून सुमित की पीठ पे गाढ़ दिए।
सुमित चुदाई के नशे में और ज़ोर से धक्के पेलने लग गया और उसका भी वीर्य विद्या की चूत में छूट गया। दोनों नंगे ही पलंग पे लेट गए और एक दूसरे को बाहो में पकड़ के सो गए। .
उस रात, पहली बार, विद्या ने किसी को अपने पास आने दिया — बिना डर, बिना शर्म, सिर्फ अपने होने की पुष्टि के लिए।
अगली सुबह, सुमित घर लौटा। पद्मावती बरामदे में बैठी थी, तुलसी में जल डाल रही थी।
“रात कहाँ था?” उसने पूछा।
“वहीं,” सुमित ने कहा।
“क्या हुआ?”
सुमित चुप रहा।
“बोल,” पद्मावती ने कहा। “मैं तेरी माँ नहीं, लेकिन तेरी चुप्पी मुझे चुभती है।”
सुमित ने सब बताया — कैसे विद्या ने दरवाज़ा खुला छोड़ा, कैसे उसने कुछ नहीं कहा, कैसे सब कुछ खुद-ब-खुद घटा।
पद्मावती ने ध्यान से सुना। फिर बोली, “अब तू किसका है?”
“मैं खुद नहीं जानता,” सुमित ने कहा।
“शेवंती को पता है?”
“नहीं।”
“तो अब खेल शुरू हुआ है,” पद्मावती मुस्कराई। “एक आग है, एक राख है… और तू बीच में जलता हुआ कोयला।”
To be Continued…


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