पद्मावती का जीवन एक अजीब खालीपन से भरा हुआ था। उसका पति हर शाम शराब में डूब जाता और रात होते-होते नशे में धुत्त होकर कहीं कोने में गिर जाता। उसके लिए पत्नी का कोई मतलब नहीं था—न भावनाओं में, न शरीर में। पद्मावती ने कई बार कोशिश की थी कि वह उसे समझाए, उसे अपने पास खींचे, लेकिन हर बार वही जवाब मिलता: शराब ही उसकी दुनिया थी। धीरे-धीरे उसने यह स्वीकार कर लिया कि उसके पति से उसे कभी सुख नहीं मिलेगा। लेकिन उसका शरीर अब भी ज़िंदा था, उसकी इच्छाएँ अब भी जागती थीं। वह औरत थी, जवान थी, और उसकी भूख को दबाना आसान नहीं था। यही वजह थी कि उसने अपने भीतर एक आदत बना ली थी—पुरुषों को लुभाने की। उसे पता था कि उसकी आँखों में एक चमक है, उसकी मुस्कान में एक खिंचाव है, और उसका शरीर अब भी आकर्षक है। उसने तय कर लिया था कि अगर उसका पति उसे नहीं देखता, तो वह खुद अपनी भूख मिटाएगी।
एक रात जब वह बाज़ार से लौट रही थी, उसने टैक्सी रोकी। ड्राइवर थका हुआ था, आँखों में नींद और चेहरे पर पसीना। उसकी उम्र ४० साल होगी । घर पहुँचकर पद्मावती ने धीरे से कहा, “इतनी देर तक काम करता है? थक जाता होगा।” ड्राइवर ने हँसकर कहा, “क्या करें, मैडम। पेट पालना है।” पद्मावती ने दरवाज़ा खोला और रुक गई। “पानी पियोगे? इतनी देर तक गाड़ी चलाने के बाद गला सूखता होगा।” ड्राइवर झिझका, फिर भीतर आया। कमरे में हल्की रोशनी थी। पद्मावती ने गिलास भरकर उसके हाथ में दिया और मुस्कराकर बोली, “तू बहुत चुप है। इतनी देर तक गाड़ी चलाता है, पर किसी से बात नहीं करता?” ड्राइवर ने कहा, “बात करने का वक्त कहाँ मिलता है।” पद्मावती ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से कहा, “तो आज कर ले। मैं सुनूँगी। तू मुझे देख… और बता कि क्या सोचता है।” ड्राइवर ने उसकी आँखों में झाँका और बोला, “आपकी आँखें… बहुत अलग हैं।” पद्मावती पास आई, “अगर बुला रही हूँ… तो तू आएगा?” उसकी साँसें भारी हो गईं। पद्मावती ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं चाहती हूँ कि ये हाथ मुझे छुएँ। धीरे से। जैसे तू गाड़ी चलाते समय स्टीयरिंग को पकड़ता है।” ड्राइवर काँपते हुए बोला, “आप सच में चाहती हैं?” पद्मावती ने दृढ़ता से कहा, “हाँ। आज मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे देखे। कोई मुझे छुए। कोई मुझे महसूस करे। और तू… तू वही है।” कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उनके बीच शब्दों की लहरें थीं—जो धीरे-धीरे स्पर्श में बदलने लगीं।
ड्राइवर के पसीने की बदबू पद्मावती को खुशबू लग रहो थी। उसके मुँह से आती तम्बाकू की बदबू भी उसको महक लग रही थी। ड्राइवर ने पद्मावती की कमर में हाथ डाला और उसको खींच के उसके होठ चूसने लाग गया। पद्मावती और ड्राइवर दोनों एक दूसरे के अघोष में खोते चले गए। पद्मावती ने पहले खुद के कपडे उतार दिए और उसके बाद ड्राइवर के भी कपडे उतार दिए। ड्राइवर ने पहले शायद ऐसी स्टैण्डर्ड औरत नहीं देखि थी , वह पागलो की तरह पद्मावती के शरीक को चूसने और चाटने लग गया। बीच बीच में कही कही काटता तो पद्मावती कसमसा जाती। शाम हो गयी थी और समय की पाबन्दी थी। पद्मावती का पति कभी भी घर आ सकता था। उसने जैसे ही ड्राइवर के लोडे को हाथ में पकड़ा, वह समझ गयी के आज उसकी चूत की भरपूर कुटाई होने वाली है। उसका लोढ़ा लोहे की तरह कड़क था। ड्राइवर ने भी पद्मावती को गांड से पकड़ कर उठाया और पलंग पे पटक दिया। पद्मावती ने उसको अपने ऊपर खींच के टाँगे फैला दी। ड्राइवर ने अपना लोढ़ा उसकी चूत में सेट कर के धक्का मारा और दोनों में जुंग शुरू हो गयी। दोनों एक दूसरे को नोचते दबोचते घमासान चुदाई करने लग गए। ड्राइवर पद्मावती के सामने नहीं टिक पाया । पद्मावती का जोश उफान पे था जब ड्राइवर पस्त हथा ये सोच के वह खुश थी।
कुछ ही दिनों बाद एक सेल्समैन घर आया। उसके हाथ में बैग था, जिसमें कई सामान थे। उसने कहा, “मैडम, नए किचन सेट आए हैं। देख लीजिए।” पद्मावती ने मुस्कराकर दरवाज़ा खोला, “अंदर आ जा। बाहर धूप बहुत है।” वह भीतर आया, पसीने से भीगा हुआ। पद्मावती ने उसे पानी दिया और कहा, “इतनी धूप में घूमता है… थक जाता होगा।” उसने कहा, “हाँ, पर काम करना है।” पद्मावती ने उसकी आँखों में देखा और बोली, “तेरी आँखों में थकान है… पर कुछ और भी है।” सेल्समैन ने पूछा, “क्या?” पद्मावती ने मुस्कराकर कहा, “चाहत। तू मुझे देख रहा है… जैसे कोई भूखा आदमी खाना देखता है।” वह चौंक गया, “मैडम…” पद्मावती ने उसे रोका, “मैडम मत कह। आज मुझे औरत समझ। औरत… जो भूखी है। तू मुझे देख… और बता कि क्या चाहता है।” उसकी साँसें तेज़ हो गईं। “मैं… मैं आपको छूना चाहता हूँ।” पद्मावती ने मुस्कराकर कहा, “तो छू। पर धीरे से। जैसे तू अपने सामान को संभालता है। जैसे तू हर चीज़ को ध्यान से रखता है। वैसे ही मुझे रख।” सेल्समैन ने उसका हाथ पकड़ा और काँपते हुए पूछा, “आप सच में चाहती हैं?” पद्मावती ने दृढ़ता से कहा, “हाँ। आज मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे देखे। कोई मुझे छुए। कोई मुझे महसूस करे। और तू… तू वही है।” कमरे में सन्नाटा था, लेकिन उनके बीच शब्दों की लहरें थीं—जो धीरे-धीरे स्पर्श में बदलने लगीं
नौजवान सेल्समेन, 22–२३ साल का , पद्मावती के हाथ लगा था। पद्मावती उसपर भूकी बिल्ली की तरह टूट पड़ी। नौजवान लौंडा देख के वह खुद को कण्ट्रोल नहीं कर पा रही थी। सेल्समेन भी उतना ही जोश में पद्मावती के अंगो को निचोड़ रहा था । दोनों ने एक दूसरे के कपडे उतारे और सेल्समन ने पद्मावती को घुटने के बल बिठा के उसके मुँह में लंड दाल दिया । पद्मावती भी बड़े प्यार से उसको चूसने लगी । चूसते चूसते वह लोडे का जायजा ले रही थी । ड्राइवर के जैसा नहीं था पर उसके शराबी पति से बोहोत बेहतर था। पद्मावती बिस्तर पर आ गयी और पाँव फैला दिए। उसको लगा सेल्समन चढ़ के चोदेगा लेकिन सेल्समेन ने अपना मुँह पद्मावती की चूत पे लगाया और चाटने लग गया। पद्मावती के बंद में करंट दौड़ने लग गया। सेल्समेन के हाथ पद्मावती के छोटे छोटे लेकिन कड़क बुब्बे दबा रहे थे और उसका मुँह पद्मावती का रास पी रहा था। पद्मावती शायद 8-10 साल के बाद झड़ने वाली थी। उसको इतना सुखी एहसास पहले कब मिला था याद भी नहीं । उसने सेल्समेन का सर अपनी चूत पे दबाया और झड़ने लग गयी। वह अभी भी आँख बंद कर के झड़ने के मज़े ले रही थी के तभी सेल्समेन ने अपना लंड उसकी चूत में टिका के अंदर घुसेड़ दिया और जानवरो की तरह चोदने लग गया । पद्मावती तो सातवे आसमान पे थी । वह फिर से जोरदार झड़ने लग गयी। उसने सेल्समेन को कस के जकड लिया और उसकी पीठ में अपने नाख़ून गाढ़ दिए। सेल्समन भी पूरे जोश में चोदते हुए उसकी चूत में झड़ गया। दोनों भी चरम सुख के अनुभव में खोये हुए थे । कुछ देर बाद सेल्समेन उठा और कपडे पेहेन ने लग गया । उसने पद्मावती से पूछा “मैडम वापस कब आउ ? ” पद्मावती ने कहा ” मै तो यहाँ मेहमान आयी हु। आज रात की गाडी से मेरठ चली जाउंगी। वाहा आना। ”
इन दोनों अनुभवों ने पद्मावती की भूख को और गहरा कर दिया। टैक्सी ड्राइवर और सेल्समैन उसके लिए सिर्फ साधन थे। वे उसके खालीपन को भरने के छोटे-छोटे पल थे। लेकिन अब उसकी नज़र अपने ही घर में टिक गई थी—सुमित पर। सुमित उसका बेटा था। जवान, मजबूत, और भीतर से उलझा हुआ। पद्मावती ने देखा कि सुमित लगातार दो औरतों को संतुष्ट कर रहा है। सुबह वह विद्या के पास जाता है, उसकी आग में जलने के लिए। रात को वह शेवंती के पास जाता है, उसकी राख में गर्माहट खोजने के लिए। पद्मावती ने यह सब ध्यान से देखा। उसकी आँखों में ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि भूख थी। उसे लगता था कि सुमित में वही ताक़त है जो उसे चाहिए।
वह सोचती थी: “यह लड़का दो-दो औरतों को संभाल सकता है। उसकी ताक़त, उसकी चाहत, उसकी वासना—सब कुछ साफ दिखता है। और मैं? मैं अकेली हूँ। मेरा पति शराब में डूबा है। मुझे कोई नहीं देखता। लेकिन यह लड़का… यह मुझे देख सकता है। यह मुझे दे सकता है जो मुझे चाहिए।” धीरे-धीरे उसने सुमित को परखना शुरू किया। कभी उसकी थकान पर चिंता जताती, कभी उसकी आँखों में सीधे देखती, कभी हल्की मुस्कान से उसे असहज करती। उसका मकसद साफ था—सुमित को अपने कमरे तक खींचना।
अब सुमित तीन औरतों के बीच फँस चुका था: शेवंती—आग, विद्या—राख, और पद्मावती—भूख। हर औरत उसे अलग तरह से खींच रही थी, और सुमित धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा था।


Leave a Reply