विद्या खाट के किनारे बैठी थी, पीठ खिड़की की ओर। सुबह की हल्की धूप फटी हुई परदे से छनकर ज़मीन पर बिखर रही थी। उसकी साड़ी की किनारी गीली थी — शायद रात की बारिश में भीग गई थी या फिर किसी और वजह से।
उसके कंधे पर एक नीला निशान उभर आया था। हल्का-सा, पर बोलता हुआ।
शेवंती चुपचाप कमरे में आई। हाथ में हल्दी वाला दूध था। बिना कुछ कहे, उसने गिलास स्टूल पर रखा। उनकी नज़रें मिलीं — एक पल को — फिर अलग हो गईं, जैसे दो अजनबी किसी स्टेशन पर एक ही ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हों।
आँगन में झाड़ू की आवाज़ गूंज रही थी। हर खिंचाव जैसे एक सवाल पूछ रहा हो।
राजत अब भी सो रहा था। या शायद सोने का नाटक कर रहा था।
विद्या उठी। उसके घुटनों में हल्की थरथराहट थी। वह बाथरूम में गई, दरवाज़ा बंद किया, और नल खोल दिया। पानी बहता रहा। वह ज़मीन पर बैठ गई — नहाई नहीं, बस बहते पानी की आवाज़ में खुद को खो दिया।
वहा अपने घर पे सुमित ज़मीन पर बैठा था, दीवार से पीठ टिकाए। गोद में कॉपी थी, जिसमें वह कुछ रेखाएँ खींच रहा था — अधूरी आँखें, एक औरत का हाथ, टूटी चूड़ी।
पद्मावती रसोई से झाँक रही थी।
“आज फिर कॉलेज नहीं गया?” उसने पूछा।
सुमित ने सिर हिला दिया।
“कुछ चाहिए?”
कोई जवाब नहीं।
वह पास आई, उसके बगल में बैठ गई। कॉपी में झाँका। “ये हाथ किसका है?”
सुमित ने कॉपी बंद कर दी।
“कभी-कभी,” पद्मावती बोली, “खुद से भी छुपाना पड़ता है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं।”
सुमित ने उसकी ओर देखा। “आप क्या कहना चाहती हैं?”
“कुछ नहीं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “बस इतना कि… तू अब बच्चा नहीं रहा।”
सुमित अचानक उठ खड़ा हुआ। “मैं बाहर जा रहा हूँ।”
“कहाँ?” उसने पूछा, पर जवाब की ज़रूरत नहीं थी। वह जानती थी।
सुमित सामने वाले घर में गया, विद्या के कमरे में नहीं, शेवंती के कमरे मे।
कमरे में हल्का उजाला था — एक पीतल का दीपक जल रहा था। गुलाब के तेल की खुशबू हवा में तैर रही थी। शेवंती पलंग के किनारे बैठी थी, बालों में कंघी करती हुई।
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“खुला है,” उसने बिना देखे कहा।
सुमित अंदर आया। झिझकता हुआ। दरवाज़ा बंद कर दिया।
शेवंती ने आईने से उसकी ओर देखा। “आ गया तू?”
सुमित ने सिर हिलाया।
“तू मुझे देखता है… जैसे कोई भूखा आदमी रोटियों को देखता है।”
सुमित का चेहरा लाल हो गया। “मैं… ऐसा कुछ नहीं…”
वह पास आई। “झूठ मत बोल। तेरी आँखें बोलती हैं।”
उसने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
“डर मत। मैं तुझे तोड़ने नहीं आई।”
सुमित ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ आग थी, पर कोई जल्दबाज़ी नहीं।
“कल रात तू आया था , बहु को देख के तू क्या सोच रहा था?
“तू आजकल बहुत सोचता है,” उसने कहा।
सुमित ने सिर उठाया। “सोचना बंद नहीं होता।”
“किसके बारे में?” उसने पूछा।
सुमित चुप रहा।
“विद्या?” शेवंती ने सीधा सवाल किया।
सुमित ने नज़रें चुरा लीं।
“मैं देखती हूँ,” शेवंती बोली। “जब तू उसे देखता है, तेरी आँखें कुछ और कहती हैं।”
“वो… टूटी हुई है,” सुमित ने कहा।
“और तू उसे जोड़ना चाहता है?” उसने पूछा।
“नहीं,” सुमित ने धीरे से कहा। “मैं उसे महसूस करना चाहता हूँ।”
शेवंती की आँखें चमक उठीं। “कैसे?”
“जब वो पास होती है, तो लगता है जैसे कुछ भीतर खिंचता है। उसकी साँसें, उसकी चुप्पी… सब कुछ मुझे बाँधता है।”
“तू उसे चाहता है?” शेवंती ने पूछा।
“हाँ। पर समझ नहीं पा रहा — ये चाहत है या वासना।”
शेवंती उठी। उसके पास आई। “वासना को समझने की ज़रूरत नहीं होती। उसे बस दिशा देनी होती है।”
सुमित ने उसकी ओर देखा। “आप क्या करना चाहती हैं?”
“तुझे दिशा देना,” शेवंती ने कहा।
“पर मैंने कुछ किया नहीं,” सुमित ने कहा।
“तूने किया नहीं, पर चाहा है। और चाहत ही शुरुआत होती है।”
वह उसके और पास आई। “विद्या तुझे खींचती है। मैं तुझे बदल सकती हूँ।”
“आप क्यों?” सुमित ने पूछा।
“क्योंकि मैं देख रही हूँ — तू अब किसी मोड़ पर खड़ा है। और मैं तय कर सकती हूँ कि तू किस ओर मुड़े।”
सुमित चुप रहा।
शेवंती ने उसके चेहरे को हल्के से छुआ। “तू मेरा हो सकता है। लेकिन पहले… मुझे देख। वैसे जैसे तू उसे देखता है।”
सुमित की साँसें तेज़ हो गईं।
“अब मैं तुझे वो दूँगी,” शेवंती ने कहा, “जो तू उससे माँगने की हिम्मत नहीं करता।”
उसने एक हाथ बढ़ा के सुमित के लंड को सहलाया।
सुमित सिहर गया, शेवंती ने अपना पल्लू नीचे गिराया और सुमित का हाथ अपनी छाती पे रखा।
सुमित को और निर्देश की ज़रुरत नहीं थी, वह शेवंती के दूध दबाने लग गया। कद में छोटी थी शेवंती, सुमित उसके गाल को चाटने लगा और उसके ब्लाउज के हुक खोलने लग गया।
शेवंती ने उसका लंड उसकी बरमूडा चड्डी से बहार निकाल लिया था और उसको हाथ से सेहला के खड़ा करने लग गयी।
सुमित उसके दूध चूसते चूसते उसको पलंग के पास ले गया।
शेवंती ने सुमित के कपडे जल्दी जल्दी में उतार दिए और पलंग पे घुटने मोड़ के साडी ऊपर उठा के लेट गयी।
सुमित उसके पैरो के बीच में आ गया।
शेवंती की काले – सफ़ेद बालो वाली चूत उसको दिख गयी क्यों की शेवंती ने अंदर कुछ नहीं पहना था।
सुमित को चूत का लाल दाना सुर गुलाबी छेद दीखते ही उसने उसको हाथ से छूआ।
शेवंती की बूढी चूत पानी पानी हो रही थी।
उसने सुमित को अपने ऊपर खींचा ” चल, धकेल अंदर।” सुमित ने लंड सेट किया और धकेला।
वह फिसल के बहार आ गया। शेवंती ने हाथ में पकड़ के लंड को उसकी चूत में लगा दिया।
सुमित ने एक धक्का मारा और लुंड चूत की गहराइयों में समां गया।
शेवंती का पति अब उसको चोदता नहीं था – खेत में ही रहता था। कभी कभी घर आता।
शेवंती को जवान ताज़ा लंड लेने में बोहोत अलग मज़्ज़ा आ रहा था, सुमित के लंड ने भी पहली बार चूत चखी थी- वह सटासट कमर हिला के शेवंती को पेलने लग गया।
छोटीसी शेवंती , सुमित के नीचे पूरी तरह डाब गयी थी।
सुमित उसको पागलो की तरह चोद रहा था। शेवंती को और सुमित को एक साथ पानी आ गया।
सुमित उसके ऊपर पड़े पड़े हाफने लग गया।
जब साँसे ठीक हुई तो सुमित उठा और अपने कपडे पेहेनने लग गया। शेवंती ने भी अपना ब्लाउज उठा के पेहेन लिया।
शेवंती जानती थी की ये रुकेगा नहीं – विद्या को भी चोदेगा, मौका मिलते ही। लेकिन वह देखना चाहती थी, विद्या सुमित से चुदवायेगी या नहीं।
” वह इतना मज़ा नहीं देगी, टूटी फूटी है। ”
सुमित चुप रहा – जाने के लिए दरवाज़े की और मुड़ा
“कल फिर आना,” उसने कहा। “लेकिन इस बार… सवाल मत लाना। सिर्फ जवाब देना।”
यहाँ पद्मावती अपने घर के बरामदे में स्टील के गिलास में छाछ लिए बैठी थी, सामने शेवंती के घर की खिड़की से आती रौशनी को देखती हुई। उसने सुमित को चुपचाप बाहर निकलते देखा — उसके कदम धीमे थे, चेहरा अनकहा।
वह कुछ नहीं बोली।
जब सुमित लौटा, वह अब भी वही थी।
“पानी चाहिए?” उसने पूछा।
सुमित ने सिर हिलाया।
“तेरी चाल बदल गई है,” उसने कहा।
सुमित ने नज़रें चुरा लीं।
“वो क्या बोली?”
“कुछ नहीं। बस… बात हुई।”
“बात में हाथ जुड़ गए? साँसें पास आईं?”
सुमित चुप रहा।
“डर मत,” उसने कहा। “मैं रोकने नहीं आई हूँ। मैं बस जानना चाहती हूँ… क्या हुआ वहाँ?”
सुमित ने धीरे से कहा, “उसने मुझे छुआ।”
“कहाँ?”
“हाथ पर। कंधे पर। फिर… बहुत पास आ गई थी।”
“और तू पीछे हटा?”
सुमित ने सिर हिला दिया।
“तो तू अब उसके खेल में है।”
“आपको इससे क्या लेना देना?”
“क्योंकि अगर कभी मुझे उससे कुछ लेना हो… तो तेरी ये कहानी काम आएगी।”
सुमित सन्न रह गया।
वह मुस्कुराई — और बिना आवाज़ किए चली गई।
अगली सुबह
विद्या कपड़े तह कर रही थी, जब उसकी नज़र एक चूड़ी पर पड़ी — चाँदी की, हल्की मुड़ी हुई, आँगन के कोने में पड़ी थी।
वह झुकी, उठाया। उसकी नहीं थी।
पर वह जानती थी — ये किसकी है।
To Be Continued…


Leave a Reply