रात के साढ़े नौ बजे थे। रसोई में दाल की महक थी, लेकिन उस महक में घुली थी एक अनकही घबराहट। गैस पर रखी कड़ाही में तड़का चटक रहा था, पर विद्या के हाथ काँप रहे थे। उसकी साँसें तेज़ थीं, जैसे हर पल कोई तूफ़ान आने वाला हो।
रजत का गुस्सा आज फिर उबलने वाला था — वजह चाहे कुछ भी हो। कभी नमक ज़्यादा, कभी फोन पर मुस्कान, कभी कोई पुराना शक। और जब शक उबलता था, तो सिर्फ शब्द नहीं, हाथ भी उठते थे।
दरवाज़ा खुला। रजत अंदर आया, आँखों में शराब की लाली और शक की आग।
“कहाँ थी तू दोपहर में?” — उसकी आवाज़ में तल्ख़ी थी।
“पद्मावती दीदी के पास गई थी… उनकी तबीयत—”
“झूठ मत बोल!” — और फिर वही हुआ।
रजत ने उसकी ओढ़नी खींची और फिर उसको नीचे गिरा के उसके दूध पर लात मारने लग गया, उसके बड़े बड़े उरोज़ दर्द से फटने को हो गए. फिर उसने उसकी कुर्ती फाड़ दी और उसके शरीर पर जगह जगह जानवरो की तरह काटने लगा और उसकी पसलियों में घुसे मारने लग गया. विद्या सोच रही थी मौत आ जाए तो अच्छा होगा लेकिन उसके नसीब में सिर्फ दर्द था. मौत नहीं.
उसका दुपट्टा फर्श पर गिर गया था। कंधे पर खरोंच, पीठ पर नीला निशान, बाँह पर दाँत के गहरे निशान। उसकी साँसें टूट रही थीं, लेकिन आँखें अब भी खुली थीं — जैसे वो सब कुछ देखना चाहती थी, सहना नहीं।
विद्या — 30 साल की, लगभग 5 फीट कद, गोरी रंगत, पतली कमर और गोलाई लिए हुए कूल्हे। उसकी चाल में एक धीमी लय थी, कपड़ों की सादगी में भी एक अनजाना आकर्षण — ऐसा जो नज़रों को खींचता था, पर शब्दों से परे था। लेकिन उस सौंदर्य पर अब चोटों की परछाइयाँ थीं।
रात के खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। विद्या आँगन में बैठी थी, ओढ़नी से अपने हाथ की नीली नसों को ढँकने की कोशिश करती हुई। उसकी आँखें सूखी थीं — आँसू अब शायद डर से भी ज़्यादा थक चुके थे।
तभी पद्मावती आई — रजत की मुंहबोली बहन। उम्र 43, लगभग 5 फीट, गोरी रंगत, शरीर में कोई विशेष आकर्षण नहीं, लेकिन चाल में बेफिक्री और नज़रों में आत्मविश्वास। उसके पहनावे में खुलापन था, बातों में बेबाकी।
“दिखा ज़रा,” पद्मावती ने कहा।
विद्या ने ओढ़नी हटाई। कंधे पर खरोंच, पीठ पर नीला निशान, बाँह पर दाँत के गहरे निशान।
“ये सब… अब और नहीं सहना चाहिए तुझे।” — पद्मावती की आँखें भर आईं।
“मैं क्या करूँ दीदी?” — विद्या की आवाज़ टूटी हुई थी। “हर बात पर शक करता है। कभी नमक ज़्यादा, कभी फोन पर मुस्कान…”
“और तू चुप रहती है,” पद्मावती ने कहा।
“क्योंकि बोलूँ तो और मारता है।”
तभी धीमे कदमों की आहट आई। शेवंती थी — रजत की माँ। उम्रदराज़, 4 फीट 8 इंच, गोरी रंगत, बालों में हल्की चाँदी, चाल में लचक और नज़रों में तेज़। उसकी आँखें सब कुछ देख चुकी थीं।
“फिर मारा?” — शेवंती ने पूछा।
“हाँ माँजी,” विद्या ने कहा।
“कहाँ मारा?” — आवाज़ में न कोमलता थी, न कठोरता — बस एक सीधी सच्चाई।
विद्या ने फिर से ओढ़नी हटाई।
शेवंती ने एक लंबी साँस ली। “बचपन से ऐसा ही है। खिलौने तोड़ता था, जानवरों को मारता था। अब तुझे मारता है।”
“आप कुछ कहती क्यों नहीं?” — पद्मावती ने पूछा।
“क्योंकि जब तक तू चुप है, सब चुप हैं,” शेवंती ने विद्या की ओर देखा। “तू बोलेगी तो मैं भी बोलूँगी।”
“मैं डरती हूँ…” — विद्या की आँखें भर आईं।
“डर से ज़्यादा खतरनाक है चुप्पी,” शेवंती ने कहा।
तभी पीछे से सुमित आया — पद्मावती का बेटा। उसकी नज़रें विद्या पर टिक गईं। ओढ़नी हट चुकी थी. सुमित ने देखा विद्या के उरोज़ नाखुनो के और काटने के निशान से भरे थे. उसके कंधे पर भी काटने के निशान बने थे.
“ये सब… रजत मामा ने किया?” — सुमित की आवाज़ धीमी थी, लेकिन भीतर कुछ टूट रहा था।
“हाँ बेटा,” पद्मावती ने कहा। “हर दिन कुछ नया ज़ुल्म।”
सुमित चुप रहा। उसकी नज़रें विद्या से हट नहीं रही थीं। वो उसे बचपन से जानता था — लेकिन आज, पहली बार, उसने उसे एक औरत की तरह देखा, एक ऐसी औरत जो टूटी हुई थी, लेकिन फिर भी सुंदर थी। उसकी साँसें धीमी थीं, लेकिन आँखें अब भी बोल रही थीं।
“तुम्हें ये सहना नहीं चाहिए,” सुमित ने कहा। “तुम… इससे बेहतर की हक़दार हो।”
विद्या ने उसकी ओर देखा — पहली बार, बिना झिझक। उसकी आँखों में थकान थी, लेकिन उस पल में एक अजीब सी गर्मी भी।
शेवंती ने सुमित की नज़रें देखीं — और कुछ नहीं कहा। बस एक लंबी साँस ली।
सुमित की नज़रें विद्या से हट नहीं रही थीं। आज, पहली बार, उसने उसे उस हाल में देखा, उस रूप में देखा, जो अब तक छिपा था। उसके कंधे पर पड़े निशान, उसकी खुली गर्दन, और उस पीड़ा में डूबी आँखें — सब कुछ जैसे उसकी चेतना में उतरता जा रहा था।
“कुछ बोलना आसान नहीं है,” विद्या ने कहा। “हर बार जब मैंने कुछ कहा, उसने और मारा। और माँजी… वो सब जानती हैं, लेकिन चुप रहती हैं।”
शेवंती अब तक चुपचाप खड़ी थीं। उनकी आँखें सब कुछ देख रही थीं — सुमित की नज़रें, विद्या की काँपती उंगलियाँ, और पद्मावती की बेचैनी।
“मैं चुप नहीं रहूँगी,” शेवंती ने कहा। “लेकिन तू बोलेगी तो ही कुछ बदलेगा।”
“आपका बेटा है,” विद्या ने कहा — आवाज़ में एक काँपती हुई हिम्मत।
“हाँ, और मैं जानती हूँ कि वो क्या बन चुका है। बचपन से ही ज़िद्दी, तोड़ने वाला। अब तुझे तोड़ रहा है।”
“तो आप क्या करेंगी?” — पद्मावती ने पूछा। “सिर्फ देखती रहेंगी?”
शेवंती ने उसकी ओर देखा — “मैं देखती हूँ, लेकिन अब सोच रही हूँ। बहुत कुछ सोच रही हूँ।”
सुमित अब तक चुप था, लेकिन उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके भीतर कुछ बदल रहा था — एक बेचैनी, एक ग़ुस्सा, और एक ऐसी भावना जिसे वो नाम नहीं दे पा रहा था।
“मैं समझना चाहता हूँ,” सुमित ने कहा। “और अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”
विद्या की आँखें भर आईं। “तुम्हें नहीं समझ आता, सुमित। ये सिर्फ मार नहीं है — ये रोज़ का डर है। हर पल का डर।”
“मैं देख रहा हूँ,” सुमित ने कहा। “और अब मैं चुप नहीं रह सकता।”
उसने धीरे से विद्या की ओर कदम बढ़ाए — कोई छूने की कोशिश नहीं, बस पास खड़ा होना। उसकी नज़रें अब भी विद्या के चेहरे पर थीं — उस चेहरे पर जो थक चुका था, लेकिन अब भी सुंदर था। उसकी साँसें धीमी थीं, लेकिन उस पल में एक अजीब सी गर्मी थी — जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा हो।
पद्मावती ने सुमित की नज़रों को देखा — और कुछ नहीं कहा। लेकिन उसके चेहरे पर एक हल्की चिंता थी।
“तू क्या देख रहा है?” — शेवंती ने सुमित से पूछा।
“मैं… समझने की कोशिश कर रहा हूँ,” सुमित ने कहा।
“समझना आसान नहीं है,” पद्मावती बोली। “इस घर में औरतें सिर्फ सहती हैं।”
“पर क्यों?” — सुमित की आवाज़ में ग़ुस्सा था। “क्यों सहें?”
“क्योंकि बोलने की कीमत होती है,” विद्या ने कहा। “और वो कीमत कई बार जान से बड़ी होती है।”
शेवंती ने एक लंबी साँस ली। “मैंने बहुत कुछ देखा है। बहुत कुछ सहा भी है। लेकिन अब… अब शायद वक्त आ गया है कि कुछ बदले।”
“आप बदलेंगी?” — पद्मावती ने पूछा।
“शायद नहीं,” शेवंती ने कहा। “लेकिन मैं रोकूँगी। अब और नहीं सहूँगी। और तुझे भी नहीं सहने दूँगी।”
विद्या की आँखों में आँसू थे — लेकिन अब वो आँसू सिर्फ दर्द के नहीं थे। उनमें एक हल्की सी उम्मीद थी। एक ऐसा भाव जो बहुत समय बाद लौटा था।
सुमित अब भी वहीं खड़ा था — उसकी नज़रें अब विद्या के चेहरे से हटकर उसके हाथों पर थीं। उन काँपती उंगलियों पर, जिनमें अब भी थोड़ी गर्मी थी।
“तुम बहुत सुंदर हो,” सुमित ने अचानक कहा — आवाज़ धीमी, लेकिन साफ़।
विद्या चौंकी। पद्मावती ने उसकी ओर देखा। शेवंती की आँखें सिकुड़ गईं।
“मैं… मेरा मतलब है…” — सुमित लड़खड़ाया। “तुम्हें इस हाल में देखना… बहुत तकलीफ़देह है।”
“मैं टूटी हूँ,” विद्या ने कहा।
“नहीं,” सुमित ने कहा। “तुम टूटी नहीं हो। तुम थकी हो। लेकिन तुम अब भी… पूरी हो।”
उस रात, सुमित देर तक सो नहीं पाया।
उसके मन में एक तूफ़ान उठ रहा था — ग़ुस्सा, दुख, और… एक ऐसी भावना जिसे वो नाम नहीं दे पा रहा था। शायद ये सहानुभूति थी। शायद कुछ और।
लेकिन एक बात साफ़ थी — अब वो विद्या को सिर्फ मामी नहीं समझता था।
रात अब और गहरी हो चुकी थी। आँगन में हल्की ठंडक थी, लेकिन विद्या के शरीर पर जलन थी — उन जगहों पर जहाँ रजत के हाथों ने निशान छोड़े थे। उसकी पीठ अब भी धड़क रही थी, जैसे हर नस में कोई पुराना दर्द फिर से जाग गया हो।
शेवंती ने धीरे से बर्फ की पट्टी उसके कंधे पर रखी। कोई शब्द नहीं, सिर्फ एक लंबी साँस।
“तू जानती है,” शेवंती ने कहा, “रजत को मैंने कभी नहीं समझा। बचपन से ही वो अलग था। ज़िद्दी, गुस्सैल, और अंदर से खाली।”
“आपने उसे रोका क्यों नहीं?” विद्या की आवाज़ काँप रही थी।
“क्योंकि मैं डरती थी। और शायद अब भी डरती हूँ। लेकिन तुझे देखकर लगता है — अब डरना बंद करना होगा।”
पद्मावती अब तक चुप थीं। लेकिन उनकी आँखें सुमित पर थीं — जो अब भी विद्या को देख रहा था। उसकी नज़रें अब सिर्फ सहानुभूति नहीं थीं। उनमें कुछ और था — कुछ ऐसा जो शब्दों में नहीं आता, लेकिन महसूस होता है।
सुमित ने धीरे से कहा, “तुम्हारे शरीर पर जो निशान हैं… वो सिर्फ चोट नहीं हैं। वो कहानी हैं। और मैं वो कहानी समझना चाहता हूँ।”
विद्या ने उसकी ओर देखा — उसकी आँखों में एक हल्की चमक थी। जैसे कोई दरवाज़ा खुला हो, लेकिन अभी पूरी तरह नहीं।
“तुम क्या समझोगे?” पद्मावती ने कहा — आवाज़ में हल्की तीखीपन।
“मैं नहीं जानता,” सुमित ने कहा। “लेकिन मैं देख रहा हूँ। और जो देख रहा हूँ, वो मुझे चैन नहीं लेने दे रहा।”
शेवंती ने उसकी ओर देखा — “देखना काफी नहीं होता। करना पड़ता है।”
“मैं करना चाहता हूँ,” सुमित ने कहा। “लेकिन कैसे?”
विद्या ने धीरे से कहा, “मेरे लिए कुछ मत करो। बस मेरे साथ खड़े रहो।”
उस वाक्य में एक अजीब सी गर्मी थी — जैसे कोई पहली बार किसी को छूने की इजाज़त दे रहा हो। सुमित ने सिर हिलाया। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखें अब भी शांत।
“तू बहुत सुंदर है,” सुमित ने फिर कहा — इस बार धीमे, लेकिन साफ़।
विद्या ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसकी उंगलियाँ अब ओढ़नी को कसकर नहीं पकड़ रही थीं। वो ढीली पड़ गई थीं — जैसे कोई बंधन टूट रहा हो।
पद्मावती ने देखा — और उसकी आँखों में चिंता थी। “सुमित, ये रास्ता आसान नहीं है।”
“मैं आसान रास्ता नहीं ढूँढ रहा,” सुमित ने कहा।
शेवंती ने एक लंबी साँस ली। “अगर तू सच में साथ देना चाहता है, तो पहले खुद को समझ। ये सिर्फ एक औरत की पीड़ा नहीं है — ये एक पूरे घर की बीमारी है।”
“मैं समझूँगा,” सुमित ने कहा। “और अगर तुम सब साथ हो, तो मैं रजत से डरूँगा नहीं।”
विद्या ने उसकी ओर देखा — उसकी आँखों में अब आँसू थे, लेकिन वो आँसू अब सिर्फ दर्द के नहीं थे। उनमें एक हल्की सी उम्मीद थी।
“मैं थक गई हूँ,” विद्या ने कहा। “लेकिन शायद अब… अब मैं टूटना नहीं चाहती।”
शेवंती ने उसके हाथ पर हाथ रखा। “तू नहीं टूटेगी। मैं हूँ। पद्मावती है। और अब सुमित भी है।”
उस रात, आँगन में चार लोग थे — एक टूटी हुई औरत, एक बेबाक बहन, एक चुपचाप तेज़ माँ, और एक लड़का जिसकी आँखों में पहली बार कोई औरत उतर रही थी।
रात गहराती गई। लेकिन उस आँगन में एक बात साफ़ थी — अब चुप्पी नहीं रहेगी।
और विद्या के भीतर, कहीं बहुत गहराई में, एक हल्की सी लौ जलने लगी थी।
to be continued…


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